गुरुवार, 24 सितंबर 2026
13 दिन शेषअनंत चतुर्दशी
गणपति विसर्जन का दिन।
अनंत चतुर्दशी 2026 गुरुवार, 24 सितंबर को है — भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी। यही वह दिन है जब 14 सितंबर से आरंभ हुआ दस दिन का गणेशोत्सव विसर्जन के साथ पूर्ण होता है, और यही अनंत व्रत का दिन भी है, जिसमें भगवान विष्णु की अनंत — अर्थात् अनंत पद्मनाभ — स्वरूप में उपासना होती है और चौदह गाँठों वाला अनंत सूत्र भुजा पर धारण किया जाता है। जैन परंपरा में इसी तिथि को दस दिन का पर्युषण पर्व सम्पन्न होता है। इस गाइड में व्रत कथा, पूरी पूजा विधि, चौदह गाँठों का अर्थ, आज के समय में जल-स्रोत को हानि पहुँचाए बिना विसर्जन कैसे करें, क्षेत्रीय रूप, और संकल्प की पूर्णता पर टिके इस दिन को ज्योतिष किस दृष्टि से देखता है — सब विस्तार से दिया गया है।
एक नज़र में
- 2026 में तिथि
- गुरुवार, 24 सितंबर 2026
- तिथि
- भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी
- आराध्य
- अनंत पद्मनाभ स्वरूप में श्रीविष्णु; दिन के विसर्जन पक्ष में श्रीगणेश
- मुख्य अनुष्ठान
- अनंत सूत्र — चौदह गाँठों वाला डोरा भुजा पर बाँधना
- व्रत
- एक दिन का; परंपरा से चौदह वर्ष तक निभाया जाने वाला संकल्प
- किसका समापन, किसका आरंभ
- विसर्जन के साथ गणेशोत्सव का समापन; अगली पूर्णिमा से पितृ पक्ष का आरंभ
Kundli.me कैसे मदद करता है
उत्सव के समापन पर ज्योतिष गुरु से जानें कि आपकी वर्तमान दशा आने वाले महीनों के लिए क्या कहती है।
मेरी दशा देखेंअनंत चतुर्दशी क्या है
अनंत चतुर्दशी भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी है, और इस एक दिन में तीन परंपराएँ एक साथ आती हैं। इनमें सबसे प्राचीन है अनंत व्रत — भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप का व्रत, अर्थात् जिसका कोई अंत नहीं। इस दिन उन्हें अनंत पद्मनाभ रूप में पूजा जाता है, जो क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर विराजमान हैं। “अनंत” शब्द ही इस दिन का सार है — जिसका न आदि है न अंत, और इसी अर्थ में वह आशीर्वाद भी जो कभी समाप्त नहीं होता।
दूसरी परंपरा वही है जो आज पूरे देश में दिखाई देती है — गणेश विसर्जन। गणेश चतुर्थी, 14 सितंबर 2026 से आरंभ हुआ दस दिन का गणेशोत्सव इसी तिथि को पूर्ण होता है, और घरों, सोसायटियों तथा सार्वजनिक पंडालों में स्थापित मूर्तियाँ शोभायात्रा के साथ विसर्जित की जाती हैं। जिन घरों में डेढ़, तीन, पाँच या सात दिन के गणपति बैठते हैं, उनका विसर्जन पहले ही हो चुका होता है; अनंत चतुर्दशी विसर्जन का अंतिम और सबसे बड़ा दिन है, और यही वह दिन है जब बड़े सार्वजनिक पंडाल विदा लेते हैं।
तीसरी परंपरा जैन है। दिगंबर परंपरा में दस दिन का दशलक्षण पर्व — धर्म के दस लक्षणों का पर्युषण पर्व — अनंत चतुर्दशी को अपने अंतिम दिन पहुँचता है; उपवास, जिनालय में पूजा-विधान, शास्त्र-स्वाध्याय और क्षमा माँगने-देने की वह साधना जिस पर यह पूरा पर्व टिका है, इसी दिन शिखर पर होती है। जैन परंपराओं में पर्युषण की गणना भिन्न-भिन्न है, इसलिए समापन-दिवस सर्वत्र एक नहीं होता; दिगंबर गणना में वह यही तिथि है।
देखने में ये तीनों अलग लगते हैं, पर इनका मेल सहज है। तीनों किसी न किसी वस्तु की पूर्णता के दिन हैं — चौदह वर्ष का व्रत जो एक वर्ष और आगे बढ़ता है, दस दिन का आतिथ्य जो धीरे-धीरे बुझने के बजाय विदाई के साथ पूरा होता है, और दस दिन का संयम जो क्षमायाचना पर सम्पन्न होता है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी अपने हर रूप में पूर्णता का दिन है।
अनंत व्रत कथा — सुशीला और कौंडिन्य
इस दिन जो कथा पढ़ी जाती है, वह व्रत रखने वाले लगभग हर घर में सुनाई जाती है, और वह आशीर्वाद पाने तथा उसे पहचानने के अंतर की कथा है। सुमंतु ऋषि की पुत्री सुशीला का विवाह कौंडिन्य ऋषि से हुआ था। पति के साथ यात्रा करते हुए उन्होंने नदी-तट पर कुछ स्त्रियों को अनंत व्रत करते देखा। उन्होंने पूछा कि यह क्या है, समझा, और स्वयं भी व्रत रखकर चौदह गाँठों का अनंत सूत्र अपनी भुजा पर बाँध लिया।
उसी समय से घर में समृद्धि बढ़ने लगी। कौंडिन्य ने बढ़ती हुई सम्पन्नता को अपने ही ज्ञान और तप का फल मान लिया। जब उनकी दृष्टि पत्नी की भुजा के सूत्र पर पड़ी और उन्हें उसका महत्व बताया गया, तो वे अप्रसन्न हुए — उन्हें यह सहन न हुआ कि जो उन्होंने अर्जित किया है उसका श्रेय एक रंगीन डोरे को दिया जाए। उन्होंने वह सूत्र तोड़कर अग्नि में डाल दिया।
इसके बाद जो हुआ, कथा उसी पर सबसे अधिक ठहरती है। सम्पत्ति चली गई, घर दरिद्रता में आ गया, और कौंडिन्य अनंत भगवान को खोजने तथा क्षमा माँगने निकल पड़े। वे तब तक भटकते रहे जब तक थककर प्राण त्यागने को उद्यत न हो गए; मार्ग में उन्होंने अपना प्रश्न फलों से लदे उस आम के वृक्ष से पूछा जिसका फल कोई नहीं खाता था, गाय और बछड़े से, दो बैलों से, एक सरोवर से, गधे और हाथी से — हर कोई अपनी-अपनी पीड़ा में था और कोई सहायता न कर सका। अंत में, जब उन्होंने खोज छोड़ दी, तब भगवान विष्णु वृद्ध ब्राह्मण के वेश में प्रकट हुए और अपना स्वरूप दिखाकर बताया कि मार्ग में मिला हर प्राणी वस्तुतः वही है जिसने पूर्वजन्म में कोई व्रत भंग किया था। कौंडिन्य को चौदह वर्ष तक व्रत करने का आदेश मिला, उन्होंने वैसा ही किया — और जो खोया था, लौट आया।
इसके साथ एक और कथा कही जाती है — वनवास के समय, जब पांडव द्यूत में राज्य हार चुके थे और युधिष्ठिर ने उपाय पूछा, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें अनंत व्रत करने को कहा। दोनों कथाओं का संदेश एक ही है — यह व्रत उनके लिए नहीं है जिनका जीवन सहज चल रहा है। यह उस मोड़ के लिए है जहाँ कुछ खो चुका हो और लौटने का मार्ग दिखाई न देता हो।
यह वही कथा है जो घरों में और इस दिन की व्रत-कथा पुस्तिकाओं में पढ़ी जाती है; हम इसे परंपरा के रूप में दे रहे हैं, किसी विशेष श्लोक के प्रमाण के रूप में नहीं। संस्करणों में विवरण भिन्न मिलते हैं — कौंडिन्य को कितने प्राणी मिले और किस क्रम में — और हर परिवार वही रूप पढ़ता है जो उसकी अपनी पुस्तक में है।
अनंत सूत्र और उसकी चौदह गाँठें
व्रत का मूर्त केंद्र अनंत सूत्र है — सूत या रेशम का वह डोरा जिसे प्रायः हल्दी में रँगकर पीला-केसरिया कर लिया जाता है, कहीं-कहीं लाल भी, और जिसमें चौदह गाँठें लगाई जाती हैं। पहले अनंत पद्मनाभ की प्रतिमा के साथ इसी सूत्र का पूजन होता है, और उसके बाद ही इसे धारण किया जाता है — अधिकांश घरों में पुरुष दाहिनी भुजा पर और स्त्रियाँ बाईं भुजा पर बाँधती हैं। यह अगले वर्ष के व्रत तक, अथवा जब तक टिके तब तक पहना जाता है, और उतरने पर कूड़े में नहीं डाला जाता — उसे बहते जल या मिट्टी को समर्पित किया जाता है, और पुराना सूत्र नया धारण करने के बाद ही उतारा जाता है।
चौदह ही क्यों? इसके एक से अधिक अर्थ बताए जाते हैं, और कोई भी घर अपना अर्थ मानने में ग़लत नहीं है। सर्वाधिक प्रचलित व्याख्या यह है कि चौदह गाँठें चौदह लोक हैं — सात ऊर्ध्व और सात अधो लोक, अर्थात् समस्त सृष्टि एक ही सूत्र में पिरोई हुई, जो ठीक वही बात है जो “अनंत” नाम कहता है। कुछ लोग इन्हें व्रत के चौदह वर्ष मानते हैं, एक गाँठ प्रति वर्ष; कुछ चौदह मन्वंतर या समुद्र-मंथन के चौदह रत्न। नीचे दी गई तालिका लोक वाली व्याख्या है।
| गाँठ | लोक | पारंपरिक विवरण |
|---|---|---|
| 1 | भूलोक | पृथ्वी — एकमात्र वह लोक जहाँ कर्म वस्तुतः किया जाता है |
| 2 | भुवर्लोक | पृथ्वी और सूर्य के बीच का सूक्ष्म लोक; पितरों से सम्बद्ध |
| 3 | स्वर्लोक | देवताओं का स्वर्ग — पुण्य का फल, और नश्वर |
| 4 | महर्लोक | उन महर्षियों का लोक जो कल्प के पार रहते हैं |
| 5 | जनलोक | ब्रह्मा के मानसपुत्रों का लोक |
| 6 | तपोलोक | तप का लोक — केवल तपस्या से प्राप्य |
| 7 | सत्यलोक | सत्य का लोक, ब्रह्मा का धाम; वहाँ से लौटना नहीं होता |
| 8 | अतल | सात अधो लोकों में प्रथम — माया और मोह का लोक |
| 9 | वितल | जहाँ शिव हाटकेश्वर रूप में विराजते हैं, ऐसा वर्णन है |
| 10 | सुतल | राजा बलि को दिया गया लोक — अभिमान रहित ऐश्वर्य |
| 11 | तलातल | मयासुर की नगरी — रचित प्रतीति के रूप में जगत |
| 12 | महातल | नागों का लोक |
| 13 | रसातल | दैत्यों और दानवों का लोक |
| 14 | पाताल | सबसे नीचे का लोक, जहाँ शेषनाग माने गए हैं — वही शेष जिन पर अनंत शयन करते हैं |
सात अधो लोकों के नाम विभिन्न पुराणों की सूचियों में थोड़े भिन्न क्रम में मिलते हैं; कुछ परिवार चौदह नाम बोलते हुए गाँठें लगाते हैं, कुछ केवल गिनती करते हैं। व्रत क्रम पर निर्भर नहीं है — गाँठों की संख्या पर निर्भर है।
अनंत चतुर्दशी पूजा विधि — क्रम से
अधिकांश घरों में यह पूजा दिन के पूर्वार्ध में, स्नान के बाद और मुख्य भोजन से पहले की जाती है, और आरंभ से अंत तक यह विष्णु-पूजा ही है — विष्णु का पीत वर्ण इसमें सर्वत्र है: सूत्र में, पुष्पों में, वस्त्र में और नैवेद्य में। इसमें कहीं भी पुरोहित की अनिवार्यता नहीं है।
- 1
स्नान और स्थान की तैयारी
प्रातः स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र पहनें — यदि हो तो पीले — और पूजा-स्थल स्वच्छ करें। एक लकड़ी की चौकी पर पीला या लाल वस्त्र बिछाएँ और उस पर स्वच्छ जल का कलश रखें।
- 2
अनंत की स्थापना
शेषशायी विष्णु का चित्र या छोटी प्रतिमा स्थापित करें। जहाँ प्रतिमा नहीं होती, वहाँ अनेक घरों में दर्भ या कुश को लपेटकर सप्तफण नाग बनाया जाता है और उसी में अनंत का पूजन होता है — यह पूजा का अत्यंत प्राचीन रूप है, जिसमें कुछ भी ख़रीदना नहीं पड़ता।
- 3
संकल्प
दाहिनी हथेली में जल और कुछ अक्षत लेकर स्पष्ट स्वर में कहें कि आप कौन हैं, कहाँ हैं, और इस वर्ष अनंत व्रत कर रहे हैं — और यदि आरंभ कर रहे हैं तो यह भी कि चौदह वर्ष तक इसे निभाने का संकल्प है। संकल्प ही व्रत है; उसके बाद जो कुछ है वह विधि है।
- 4
सूत्र का निर्माण और पूजन
सूत या रेशम का धागा लें, उस पर हल्दी लगाएँ और उसमें चौदह गाँठें लगाएँ। उसे अनंत के सम्मुख रखकर देवता के साथ ही कुंकुम, अक्षत, पुष्प और दूर्वा अर्पित करें — सूत्र का पूजन धारण करने से पहले होता है, बाद में नहीं।
- 5
षोडशोपचार पूजन
जल, पीत वस्त्र या मौली, चंदन, पीले पुष्प, धूप-दीप अर्पित करें और फिर नैवेद्य — बहुत से घरों में पूरनपोली या गुड़ से बने पकवान, कहीं खीर, और महाराष्ट्र-गुजरात में चौदह की संख्या में अर्पण: चौदह पूरियाँ, चौदह मिष्ठान्न, चौदह फल या पत्ते — उसी संख्या का अनुसरण जिस पर यह दिन टिका है।
- 6
कथा श्रवण
परिवार के साथ बैठकर अनंत व्रत कथा पढ़ें या सुनें। यह कोई वैकल्पिक शोभा नहीं है — व्रत परंपराओं में कथा ही अर्थ को धारण करती है, और बच्चों को विधि भूल जाने के बहुत बाद तक कथा याद रहती है।
- 7
सूत्र धारण
आरती के बाद पूजित सूत्र भुजा पर बाँधें — अधिकांश घरों में पुरुष दाहिनी और स्त्रियाँ बाईं भुजा पर, यद्यपि कुछ परिवारों में यह उलटा है और कुछ में दोनों भुजाओं पर बाँधा जाता है। पिछले वर्ष का पुराना सूत्र अब — नया बँध जाने के बाद — ही उतारा जाता है और जल में प्रवाहित किया जाता है या किसी वृक्ष की जड़ में दबा दिया जाता है।
- 8
दान, फिर पारण
ब्राह्मण, ज़रूरतमंद या जो आपके कुल की परंपरा कहे, उसे भोजन कराएँ, यथाशक्ति दान करें, और उसके बाद ही स्वयं भोजन लें। जिन घरों में कठोर व्रत रखा जाता है, वहाँ पारण पूजा और कथा दोनों पूर्ण होने के बाद ही होता है।
चतुर्दशी सूर्योदय से गिनी जाती है, और जहाँ तिथि देर से आरंभ हो या जल्दी समाप्त हो, वहाँ पूजा का समय भी उसी के अनुसार खिसकता है — यहाँ कोई मुहूर्त नहीं छापा गया है क्योंकि वह आपके नगर के सूर्योदय और उस दिन के राहुकाल पर निर्भर है। व्रत की प्रातः अपने नगर का पंचांग देखें।
गणेश विसर्जन — इस दिन का दूसरा पक्ष
दस दिन गणपति घर में अतिथि रहे हैं, किसी ताखे पर रखी मूर्ति नहीं: नियत समय पर जगाए गए, स्नान कराया गया, भोग लगा, दिन में दो बार आरती हुई। विसर्जन उसी आतिथ्य का विधिवत समापन है, और यह विदाई है, विसर्जन के नाम पर फेंकना नहीं। मूर्ति को अंतिम आरती और नैवेद्य अर्पित होता है, परिवार दस दिनों में जो रह गया या जो त्रुटि हुई उसके लिए क्षमा माँगता है, थोड़े चावल या गेहूँ और एक सिक्का पोटली में बाँधकर मूर्ति के साथ भेजे जाते हैं, और फिर “गणपति बाप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या” के साथ मूर्ति उठाई जाती है — अगले वर्ष फिर आइए, और शीघ्र आइए।
विसर्जन कैसे किया जाए, यह पिछले एक दशक में बहुत बदला है, और यह बदलाव परंपरा के विरुद्ध नहीं, परंपरा के भीतर से आया है। प्लास्टर ऑफ पेरिस की और रासायनिक रंग वाली मूर्ति घुलती नहीं; वह टूटकर जल में पड़ी रह जाती है। नीचे दिए विकल्प सभी व्यापक रूप से प्रचलित हैं, और इनमें से कोई भी अनुष्ठान के साथ समझौता नहीं है — विसर्जन का अर्थ है जल में विलीन होना, और घर की बाल्टी मिट्टी की मूर्ति को उतनी ही पूर्णता से घोलती है जितनी नदी।
| विकल्प | किसके लिए उपयुक्त | ध्यान रखने योग्य |
|---|---|---|
| घर पर ड्रम, टब या बड़ी बाल्टी में विसर्जन | घर में स्थापित छोटी शाडू मिट्टी की मूर्तियाँ | पहले पूरी आरती और विदाई हो; बाद में मिट्टी वाला जल किसी पौधे की जड़ में डालें, नाली में कभी नहीं |
| बीज वाली मूर्ति (तुलसी, गेंदा या सब्ज़ी के बीज सहित) | वे परिवार जो चाहते हैं कि मूर्ति किसी जीवित रूप में आगे चले | जल के बजाय मिट्टी के गमले में विसर्जन; जो पौधा उगे उसे सँभालकर रखा जाता है, फेंका नहीं जाता |
| नगर निगम का कृत्रिम विसर्जन कुंड | बड़ी घरेलू मूर्तियाँ और सोसायटी की स्थापनाएँ | इस दिन अधिकांश नगरों में उपलब्ध; शोभायात्रा और विसर्जन ठीक वैसे ही होते हैं जैसे नदी पर |
| निर्धारित घाट पर नदी, तालाब या समुद्र | सार्वजनिक पंडाल और बड़ी शोभायात्राएँ | चिह्नित घाट और स्वयंसेवकों की सहायता लें; प्लास्टिक, थर्मोकोल और वस्त्र जल में न जाने दें, वापस लाएँ |
| सुपारी अथवा धातु की मूर्ति का प्रतीकात्मक विसर्जन | जिन घरों में स्थायी धातु-प्रतिमा रहती है | दस दिन साथ रखी गई सुपारी का विसर्जन किया जाता है; धातु की मूर्ति घर में ही रहती है |
निर्माल्य — दस दिनों के संचित पुष्प, पत्र, दूर्वा और प्रसाद — परंपरा से घर के कचरे में नहीं डाला जाता। अब अधिकांश नगरों में घाटों पर अलग निर्माल्य कलश रखे जाते हैं और उसमें एकत्र सामग्री की खाद बनाई जाती है।
अनंत व्रत: क्या खाएँ, क्या वर्जित
अनंत व्रत एक दिन का व्रत है और नवरात्रि या एकादशी की तुलना में सौम्य है — बल पूजा, सूत्र और संकल्प पर है, इस बात पर नहीं कि उपवास कितना कठोर है। इसका रूप कुल की परंपरा पर निर्भर है: कुछ लोग पूजा सम्पन्न होने तक निर्जल रहते हैं, अधिकांश दिन भर फलाहार लेकर कथा के बाद एक सात्विक भोजन करते हैं, और बहुत से लोग केवल इतना करते हैं कि सूत्र बँधने तक अन्न और नमक नहीं लेते।
- ग्राह्य: फल, दूध, दही, मेवा, साबूदाना, सिंघाड़े या कुट्टू से बने पदार्थ, और पूजा के बाद एक सात्विक भोजन — महाराष्ट्र में पूरनपोली, अन्यत्र खीर या गुड़ के पकवान।
- नमक: जिन घरों में कठोर रूप निभाया जाता है वहाँ केवल सेंधा नमक; साधारण नमक पारण के साथ लौटता है।
- दिन भर वर्जित: प्याज, लहसुन, माँसाहार, अंडा और मद्य — तथा अधिकांश घरों में पूजा पूर्ण होने तक अन्न।
- कुछ परिवार इस दिन जो नमक-रहित नियम रखते हैं वह नैवेद्य पर भी लागू होता है — जहाँ यह परंपरा है वहाँ चौदह पूरियाँ और मिष्ठान्न बिना नमक के बनाए जाते हैं।
- कठोर व्रत किन्हें आवश्यक नहीं: गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली स्त्रियाँ, बालक, वृद्धजन, तथा मधुमेह से पीड़ित या नियमित औषधि लेने वाले। यह छूट परंपरा ने स्वयं दी है — पूजा, कथा और सूत्र निभाएँ, और शरीर को जो आहार चाहिए वह अवश्य लें।
भारत भर में अनंत चतुर्दशी के रूप
- महाराष्ट्र — वर्ष का सबसे बड़ा विसर्जन दिवस। मुंबई और पुणे पूरे दिन और आधी रात तक पैदल चलते हैं, और बड़े मंडल सबसे अंत में समुद्र तक पहुँचते हैं। घरों में अनंत व्रत भी व्यापक रूप से रखा जाता है, नैवेद्य में पूरनपोली के साथ।
- गुजरात और राजस्थान — व्रत मुख्यतः विष्णु-व्रत के रूप में रखा जाता है, सूत्र और चौदह की संख्या वाले अर्पण के साथ; गुजरात के नगरों में गणेश विसर्जन पिछले दो दशकों में बहुत बड़ा हुआ है।
- मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और हिंदी क्षेत्र — अनंत चौदस घर का व्रत है, जिसे सबसे अधिक सूत्र के लिए ही याद किया जाता है; अनेक परिवारों में घर के बड़े व्रत रखते हैं और शेष सदस्यों के लिए भी सूत्र बँधवाते हैं।
- ओडिशा और पूर्वी भारत — अनंत चतुर्दशी अनंत सूत्र के साथ मनाई जाती है, और कुछ समुदायों में इसे उस अनंत-उपासना से जोड़ा जाता है जो जगन्नाथ के अग्रज बलभद्र के नाग-स्वरूप से सम्बद्ध है।
- जैन परंपरा — दिगंबर परंपरा में यह दशलक्षण पर्व का दसवाँ और अंतिम दिन है, जिसे उपवास, अभिषेक और जिनालय में शास्त्र-स्वाध्याय के साथ मनाया जाता है। क्षमा — माँगना और देना — वही स्वर है जिस पर यह पूरा पर्व सम्पन्न होता है।
- दक्षिण भारत — जहाँ यह दिन मनाया जाता है वहाँ प्रायः मौन रूप से; कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के कुछ भागों में अनंत पद्मनाभ व्रत रखा जाता है, जहाँ सूत्र को “अनंत दोरक” कहते हैं, और केरल की अनंत पद्मनाभस्वामी परंपरा से इसका सम्बन्ध वहाँ गहराई से अनुभव किया जाता है।
ज्योतिष की दृष्टि से अनंत चतुर्दशी
पंचांग के लगभग सभी पर्व किसी कार्य के आरंभ से जुड़े हैं। अनंत चतुर्दशी उन थोड़े-से दिनों में है जो पूरी तरह पूर्णता के हैं — और ज्योतिष में पूर्णता अपने आप में एक भारी श्रेणी है। लिया और निभाया गया संकल्प एक फलदायी कर्म माना जाता है; लिया और छोड़ा गया संकल्प भी कर्म है, पर उसका फल दूसरा है। कौंडिन्य की पूरी कथा ठीक इसी विषय पर है, और उन्हीं लोगों को सुनाई जाती है जो अन्यथा व्रत को आदत मान बैठते।
इसीलिए परंपरा इस विषय में सावधान है कि व्रत छोड़ा कैसे जाए। यदि चौदह वर्ष का अनंत व्रत आगे न निभाया जा सके — रोग, वृद्धावस्था या परिस्थिति के कारण — तो उसे यों ही छोड़ा नहीं जाता। उसका विधिवत समापन होता है: अंतिम वर्ष उद्यापन के साथ पूर्ण किया जाता है और सूत्र जल को समर्पित कर दिया जाता है। दूसरा मान्य मार्ग है व्रत को पुत्र, पुत्री या पुत्रवधू को सौंप देना, और अनेक परिवारों में यह पीढ़ियों से इसी प्रकार चला है। कथा जिस एक बात से रोकती है, वह है चुपचाप व्रत छोड़ देना।
इस दिन का प्रतीक-विधान असाधारण रूप से कसा हुआ है। अनंत अर्थात् विष्णु का अनंत स्वरूप — पालनकर्ता, और ग्रहों में जिनसे सम्बन्ध जोड़ा जाता है वे हैं गुरु, अर्थात् धर्म, आशीर्वाद और विस्तार के ग्रह; और 24 सितंबर 2026 गुरुवार को पड़ रहा है, जो गुरु का ही वार है। चौदह गाँठें वही बात दोहराती हैं: ऊपर-नीचे की समस्त सृष्टि एक अखंड सूत्र में। और उसी संध्या जो प्रतिमा जल में जाती है वह श्रीगणेश की है — विघ्नहर्ता, जिनका स्मरण हर अनुष्ठान के आरंभ में होता है और यहाँ जिन्हें एक अनुष्ठान के अंत में विदा किया जा रहा है। जो दिन एक चक्र को पूर्ण भी करता है और अगले वर्ष फिर आने का निवेदन भी करता है, वह परंपरा के अपने तर्क से उस हर वस्तु को समाप्त करने का उचित दिन है जिसे आप आवश्यकता से अधिक समय से ढो रहे हैं।
- परंपरा से यह आरंभ का नहीं, समापन का दिन है: आरंभ किया हुआ पाठ या जप पूरा करना, किसी व्रत का उद्यापन करना, कोई लंबित बात निपटाना।
- प्रायः वे लोग रखते हैं जो हानि के दौर से गुज़र रहे हों — कथा व्रत को ठीक वहीं रखती है, और कठिन दशा या साढ़ेसाती से गुज़र रहे लोगों को सामान्यतः यही व्रत बताया जाता है।
- गुरु से सम्बद्ध होने के कारण: पीत वस्त्र, गुड़ और चने की दाल, तथा किसी शिक्षक या विद्यार्थी को दिया गया दान इस दिन का प्रचलित दान है।
- इसके बाद की पूर्णिमा से पितृ पक्ष आरंभ होता है, अतः यह उस पक्ष से पूर्व का अंतिम शुभ दिन भी है — यही एक कारण है कि परिवार लंबित शुभ कार्य इससे पहले निपटा लेते हैं।
यह सब परंपरा में इस दिन का अर्थ है, आपकी कुंडली का फलादेश नहीं। यह वर्ष चौदह वर्ष का व्रत आरंभ करने का वर्ष है या नहीं, और आपकी अपनी कुंडली में वस्तुतः किस ग्रह को ध्यान चाहिए — यह आपकी चालू दशा, गोचर और सम्बद्ध भावों पर निर्भर है। चौदह वर्ष का संकल्प लेने से पहले मुफ़्त कुंडली से इतना तो देखा ही जा सकता है।
अनंत चतुर्दशी पर क्या करें, क्या न करें
- सूत्र धारण करने से पहले उसका पूजन अवश्य करें। यह कोई ख़रीदकर बाँध लेने वाला धागा नहीं है — पहले चौदह गाँठें बनाई जाती हैं और उसका पूजन होता है।
- संकल्प वही लें जिसे निभा सकें। परंपरागत अवधि चौदह वर्ष है; यदि यह व्यावहारिक न हो तो आरंभ में ही स्पष्ट कह दें कि इस वर्ष के लिए, अथवा जब तक सामर्थ्य हो तब तक, व्रत ले रहे हैं।
- विसर्जन विधिवत पूरा करें — अंतिम आरती, क्षमायाचना, चावल और सिक्के की पोटली, और मूर्ति को यथाविधि विदा करना; दस दिन बाद उसे किसी कोने में यों ही रखा न छोड़ें।
- प्लास्टिक वापस लेकर आएँ। थर्मोकोल की सजावट, पॉलिथीन, प्लास्टिक के फूल और मूर्ति पर चढ़ा वस्त्र जल में नहीं जाने चाहिए, और अब हर घाट पर इन्हें रखने की व्यवस्था होती है।
- नया सूत्र बँधने से पहले पिछले वर्ष का सूत्र न उतारें। परंपरा यह है कि भुजा कभी सूत्र से रिक्त न हो — पुराना धागा नया बँध जाने के बाद ही उतरता है।
- पुराना या टूटा सूत्र कूड़े में न डालें। किसी भी पूजित वस्तु की भाँति उसे बहते जल में प्रवाहित करें या किसी वृक्ष की जड़ में दबा दें।
- व्रत को बीच में यों ही न छोड़ें। यदि आगे निभाना संभव न हो तो उद्यापन करें अथवा परिवार में किसी को सौंप दें — कथा इसी बिंदु पर सबसे अधिक स्पष्ट है।
- विसर्जन शोभायात्रा को रात तक खींचने से पहले यह देख लें कि आपके साथ कौन है — मुंबई, पुणे और हैदराबाद में भीड़ अत्यधिक होती है, और बच्चों तथा वृद्धजनों को घाट के बाद घर भेज देना ही उचित है।
अनंत चतुर्दशी के बाद क्या
अनंत चतुर्दशी भाद्रपद शुक्ल पक्ष का अंतिम दिन है। इसके ठीक बाद की पूर्णिमा से पितृ पक्ष आरंभ होता है — श्राद्ध का वह पक्ष जिसमें पितरों को जल और अन्न अर्पित किया जाता है और जिसमें नए तथा मांगलिक कार्य परंपरा से रोक लिए जाते हैं। यही व्यावहारिक कारण है कि परिवार जो कर सकते हैं वह इस तिथि से पहले निपटा लेते हैं — गृह प्रवेश, वाहन क्रय, दुकान का उद्घाटन या सगाई प्रायः या तो अनंत चतुर्दशी से पूर्व होते हैं, या फिर नवरात्रि तक रोक लिए जाते हैं, जो पितृ पक्ष की समाप्ति पर आरंभ होती है।
इस प्रकार ऋतु का क्रम यह बनता है: दस दिन का गणेशोत्सव यहाँ पूर्ण होता है, फिर एक पक्ष पितरों को समर्पित, और उसके बाद नवरात्रि की नौ रातें, जिनसे वर्ष का सबसे बड़ा उत्सव-काल आरंभ होता है। अनंत चतुर्दशी ठीक इसी संधि पर खड़ी है।
कोई विशेष कार्य पितृ पक्ष की समाप्ति तक रोका ही जाए, यह कोई सर्वव्यापी नियम नहीं है — नित्य कार्य, चिकित्सा और पहले से आरंभ किया गया काम अधिकांश परिवारों में सामान्य रूप से चलता रहता है, और यह निषेध नए मांगलिक कार्यों पर समझा जाता है। यदि कोई तिथि मन में हो तो पूरे पक्ष को बंद मानने के बजाय उस विशेष कार्य का मुहूर्त देख लें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अनंत चतुर्दशी 2026 कब है?
अनंत चतुर्दशी 2026 गुरुवार, 24 सितंबर को है — भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी। यही 14 सितंबर 2026 से आरंभ हुए गणेशोत्सव का अंतिम विसर्जन दिवस भी है।
अनंत चतुर्दशी पर विसर्जन का मुहूर्त क्या है?
यह नगर और वर्ष के अनुसार बदलता है, क्योंकि यह आपके स्थानीय सूर्योदय तथा उस दिन के राहुकाल और चौघड़िया से निकलता है — इसीलिए यहाँ कोई समय नहीं छापा गया। अधिकांश परिवार जो व्यावहारिक नियम मानते हैं वह यह है कि आरती और विदाई दिन में पूरी कर लें और राहुकाल में विसर्जन आरंभ न करें। उस दिन प्रातः अपने नगर का पंचांग देखें।
अनंत सूत्र किस भुजा पर बाँधते हैं — दाईं या बाईं?
अधिकांश घरों में पुरुष दाहिनी भुजा पर और स्त्रियाँ बाईं भुजा पर बाँधती हैं। कुछ परिवारों में यह उलटा है और कुछ में दोनों भुजाओं पर बाँधा जाता है। ये सभी परंपराएँ प्रचलित हैं और अपने कुल की परंपरा ही मान्य है; जो नहीं बदलता वह है गाँठों की संख्या — चौदह।
क्या अनंत व्रत चौदह वर्ष तक रखना ही पड़ता है?
चौदह वर्ष परंपरागत अवधि है, जो एक ही संकल्प से ली जाती है और अंत में उद्यापन से पूर्ण होती है। यह कोई बंधन नहीं है: बहुत से लोग एक-एक वर्ष का संकल्प लेते हैं और संकल्प में यही कहते हैं, और जब निभाना संभव न रहे तो व्रत पुत्र, पुत्री या पुत्रवधू को सौंपा जा सकता है। परंपरा केवल इतना कहती है कि जो ले रहे हैं उसे सच्चाई से घोषित करें और फिर या तो पूरा करें या विधिवत समाप्त करें — चुपचाप छोड़ न दें।
यदि वर्ष पूरा होने से पहले सूत्र टूट जाए या खो जाए तो क्या करें?
इसे व्रत भंग नहीं माना जाता। वर्ष भर भुजा पर बँधा धागा घिसकर टूट ही जाता है — यह अपेक्षित है। जहाँ टूट जाए, अधिकांश परिवार उसके टुकड़े अगली अनंत चतुर्दशी तक आदर के साथ रख लेते हैं और तभी जल में प्रवाहित करते हैं; जहाँ खो जाए, वहाँ व्रत ज्यों का त्यों चलता रहता है और अगले वर्ष की पूजा में नया सूत्र बाँध लिया जाता है। संकल्प संकल्प में बसता है, धागे में नहीं।
क्या नदी के बजाय घर पर ही गणेश विसर्जन कर सकते हैं?
हाँ, और छोटी मिट्टी की मूर्ति के लिए नगरों में अब यही सबसे प्रचलित तरीका है। अंतिम आरती और विदाई पूरी विधि से करें, मूर्ति को स्वच्छ जल से भरे ड्रम, टब या बड़ी बाल्टी में विसर्जित करें, और घुल जाने पर वह जल किसी पौधे की जड़ में या मिट्टी में डालें, नाली में नहीं। विसर्जन का अर्थ है जल में विलीन होना — जल-स्रोत का आकार उसे मान्य नहीं बनाता।
अनंत चतुर्दशी विष्णु का पर्व है या गणेश का?
दोनों, एक ही तिथि को, और ये दो स्वतंत्र परंपराएँ हैं जो संयोगवश एक ही दिन पड़ती हैं। अनंत व्रत विष्णु का व्रत है और दोनों में कहीं अधिक प्राचीन; दस दिन का सार्वजनिक गणेशोत्सव, जिसका विसर्जन इसी दिन होता है, अपने वर्तमान रूप में महाराष्ट्र में उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में आया। कोई घर इनमें से एक रखे, दोनों रखे या कोई नहीं — सब चलता है।
अनंत सूत्र में चौदह गाँठें ही क्यों?
सबसे प्रचलित व्याख्या चौदह लोकों की है — सात ऊर्ध्व और सात अधो लोक, अर्थात् समस्त सृष्टि एक अखंड सूत्र में, और “अनंत” नाम का यही अर्थ है। कुछ घरों में इन्हें व्रत के चौदह वर्ष माना जाता है, कहीं चौदह मन्वंतर। ये सभी पारंपरिक व्याख्याएँ हैं; अनुष्ठान की दृष्टि से आवश्यक केवल इतना है कि गाँठें चौदह हों।
क्या अनंत चतुर्दशी को गृह प्रवेश या वाहन क्रय कर सकते हैं?
यह शुभ दिन है और पितृ पक्ष आरंभ होने से पूर्व का अंतिम दिन भी, इसीलिए परिवार लंबित कार्य इसी दिन निपटाते हैं। किंतु अनंत चतुर्दशी अबूझ मुहूर्त नहीं है — विजयादशमी या अक्षय तृतीया के विपरीत यह मुहूर्त देखने की आवश्यकता समाप्त नहीं करती। तिथि निश्चित करने से पहले उस विशेष कार्य का मुहूर्त अपनी कुंडली और चालू दशा के साथ मिलाकर देखें।
क्या स्त्रियाँ अनंत व्रत रख सकती हैं, और क्या एक व्यक्ति पूरे परिवार के लिए व्रत रख सकता है?
दोनों ही व्यापक रूप से प्रचलित हैं। स्त्री और पुरुष समान रूप से यह व्रत रखते हैं, और अनेक घरों में पति-पत्नी साथ मिलकर रखते हैं। यह भी सामान्य परंपरा है कि घर के मुखिया व्रत और पूजा पूरे परिवार की ओर से करें और पूजा के बाद शेष सदस्यों के लिए भी सूत्र बाँधे जाएँ — इस प्रकार के व्रतों में परंपरा पूरे गृहस्थ परिवार को एक इकाई मानती है।
इस पर्व के लिए मुफ़्त टूल
इस ऋतु के अन्य त्योहार
भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव।
विघ्नहर्ता श्रीगणेश का स्वागत।
पितरों का पखवाड़ा — श्राद्ध और तर्पण।
माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना।
अपनी कुंडली के बारे में लाइव सत्र में पूछिए
त्योहार का मुहूर्त सबके लिए एक है, आपकी कुंडली नहीं। ज्योतिष गुरु से पूछिए कि यह काल आपके करियर, विवाह, समय और उपायों के लिए क्या कहता है — निजी लाइव सत्र — प्रति-मिनट भुगतान, जब चाहें रोकें।
🪔 गणेश चतुर्थी विशेष — ज्योतिष गुरु त्योहार की प्रति-मिनट क़ीमत पर · जब चाहें रोकें
अपना सत्र शुरू करेंमित्रों को बुलाइए — उन्हें पहले रिचार्ज पर बोनस वॉलेट बैलेंस, और उनके परामर्श पर ख़र्च करते ही आपको ₹20 नक़द। रेफ़र करें और कमाएँ
त्योहारों की तिथियाँ चंद्र आधारित हैं और हर वर्ष बदलती हैं — योजना से पहले पंचांग पर पुष्टि अवश्य करें।