रविवार, 11 अक्टूबर 2026
29 दिन शेषशारदीय नवरात्रि
माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना।
शारदीय नवरात्रि 2026 रविवार 11 अक्टूबर से सोमवार 19 अक्टूबर तक है, और 20 अक्टूबर को विजयादशमी (दशहरा) के साथ इसका समापन होता है। आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को घटस्थापना से आरंभ होकर नौ रातों में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की एक-एक दिन आराधना होती है। इस गाइड में पूरा दिनवार क्रम, घटस्थापना और कन्या पूजन की विधि, व्रत में क्या खाएँ और क्या वर्जित है, गुजरात से बंगाल तक इसे कैसे मनाया जाता है, और ज्योतिष इन नौ दिनों को वर्ष का सबसे प्रबल मुहूर्त-काल क्यों मानता है — सब विस्तार से दिया गया है।
एक नज़र में
- 2026 में तिथि
- 11–19 अक्टूबर 2026 (दशहरा 20 अक्टूबर)
- तिथि
- आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक
- आराध्य
- माँ दुर्गा — नवदुर्गा स्वरूप
- आरंभिक अनुष्ठान
- पहले दिन घटस्थापना (कलश स्थापना)
- व्रत
- पूरे नौ दिन, या केवल पहला और अष्टमी/नवमी — दोनों मान्य हैं
- समापन
- कन्या पूजन, हवन और विजयादशमी
Kundli.me कैसे मदद करता है
जानें कि नवरात्रि के नौ दिन आपकी राशि के लिए क्या लाते हैं, और इस शुभ समय में नई शुरुआत करें।
नवरात्रि में मेरी राशिनवरात्रि 2026 — दिनवार क्रम
नौ में से हर दिन देवी के एक स्वरूप का है, और यह क्रम निश्चित है; हर दिन का एक पारंपरिक भोग भी है। पहला दिन घटस्थापना का है, तथा आठवें और नौवें दिन दुर्गाष्टमी एवं महानवमी पड़ती हैं।
| दिन एवं तिथि | देवी स्वरूप | किसके लिए | भोग |
|---|---|---|---|
| दिन 1 — रवि 11 अक्टूबर | शैलपुत्री | घटस्थापना; स्थिरता और धैर्य | शुद्ध घी |
| दिन 2 — सोम 12 अक्टूबर | ब्रह्मचारिणी | संयम, विद्या, संकल्प की रक्षा | शक्कर |
| दिन 3 — मंगल 13 अक्टूबर | चंद्रघंटा | साहस, भय-नाश | खीर अथवा दूध |
| दिन 4 — बुध 14 अक्टूबर | कूष्मांडा | आरोग्य, ऊर्जा, समृद्धि | मालपुआ |
| दिन 5 — गुरु 15 अक्टूबर | स्कंदमाता | संतान, मातृत्व, गृह-शांति | केला |
| दिन 6 — शुक्र 16 अक्टूबर | कात्यायनी | विवाह तथा विवाह-बाधा निवारण | शहद |
| दिन 7 — शनि 17 अक्टूबर | कालरात्रि | रक्षा; विघ्न-नाश | गुड़ |
| दिन 8 — रवि 18 अक्टूबर (दुर्गाष्टमी) | महागौरी | पवित्रता, क्षमा, कन्या पूजन | नारियल |
| दिन 9 — सोम 19 अक्टूबर (महानवमी) | सिद्धिदात्री | सिद्धि; हवन एवं व्रत पारण | तिल |
तिथि सूर्योदय से गिनी जाती है, मध्यरात्रि से नहीं, और तिथि की वृद्धि या क्षय हो सकता है — ऐसे वर्षों में एक ही दिन दो स्वरूपों का पूजन होता है या एक दिन दोहराया जाता है, और नौ रातें आठ या दस कैलेंडर तिथियों में भी पड़ सकती हैं। पूजा निश्चित करने से पहले अपने नगर के पंचांग में उस दिन की तिथि अवश्य देखें।
घटस्थापना (कलश स्थापना) विधि
घटस्थापना नवरात्रि का आरंभिक आवाहन है — देवी को कलश में आमंत्रित किया जाता है और वह कलश नौ दिन घर में स्थापित रहता है। यह प्रतिपदा को की जाती है, और परंपरा स्पष्ट है कि इसे दिन के प्रथम तृतीयांश में करना चाहिए — राहुकाल तथा चित्रा/वैधृति योग में कदापि नहीं। यदि प्रातःकाल संभव न हो तो मध्याह्न का अभिजित मुहूर्त मान्य विकल्प है।
- 1
स्थान की तैयारी
पूजा-स्थल स्वच्छ करें और यथासंभव घर के ईशान कोण में रखें। एक चौड़े मिट्टी के पात्र में मिट्टी बिछाएँ — यही जौ बोने का आधार है, लगभग दो अंगुल गहरा।
- 2
जौ बोना
मिट्टी पर जौ बिखेरें, ऊपर मिट्टी की पतली परत डालें और जल छिड़कें। नौ दिनों में उगने वाले अंकुर ही जयंती या खेत्री कहलाते हैं; अंत में उनके रंग और सघनता को वर्ष के शुभाशुभ संकेत के रूप में देखा जाता है।
- 3
कलश भरना
ताँबे या मिट्टी के कलश में स्वच्छ जल भरें; उसमें अक्षत, सुपारी, एक सिक्का, दूर्वा और गंगाजल डालें। कलश के कंठ पर मौली बाँधें।
- 4
कलश का शृंगार
कलश के मुख पर आम या अशोक के पाँच पत्ते रखें और ऊपर लाल वस्त्र में लपेटा साबुत नारियल स्थापित करें। कलश को बोए हुए पात्र के मध्य में रखें।
- 5
आवाहन और संकल्प
दीप प्रज्वलित करें, परंपरानुसार पहले श्रीगणेश का आवाहन करें, फिर कलश में माँ दुर्गा को आमंत्रित कर संकल्प लें — कितने दिन का व्रत रखेंगे (नौ दिन, अथवा प्रथम दिन के साथ अष्टमी/नवमी) और किस कामना से, यह स्पष्ट बोलकर कहें। यदि अखंड ज्योति रखनी है तो इसी समय प्रज्वलित करें और उसे बुझने न दें।
- 6
नित्य सेवा
प्रतिदिन प्रातः जौ पर हल्का जल दें, उस दिन का भोग अर्पित करें, और जो चुना है उसका नियत समय पर पाठ करें — दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा, या केवल उस दिन का बीज मंत्र। विस्तार से अधिक महत्व नियमितता का है।
घटस्थापना का मुहूर्त हर नगर और हर वर्ष में भिन्न होता है, क्योंकि वह सूर्योदय और उस दिन के राहुकाल पर निर्भर है — इसीलिए यहाँ कोई समय नहीं छापा गया है। पहले दिन प्रातः अपने नगर का पंचांग देखें।
अखंड ज्योति — दीप को अविच्छिन्न रखना
अखंड ज्योति वह दीप है जो घटस्थापना के संकल्प के साथ प्रज्वलित होकर दशमी तक एक क्षण भी बुझे बिना जलता रहे। यह अनिवार्य नहीं है — असंख्य घरों में नवरात्रि केवल संध्या के साधारण दीप के साथ अत्यंत सुंदर रूप से मनाई जाती है — किंतु यदि आपने इसका संकल्प लिया है तो वही संकल्प आपको बाँधता है, अतः पहले दिन से पूर्व यह जान लेना उचित है कि यह वास्तव में क्या माँगता है।
- स्थान: परंपरा से घी का दीप देवी के दाहिनी ओर और तेल का दीप बाईं ओर रखा जाता है। घी के दीप में रुई की बत्ती, और तेल के दीप में परंपरागत रूप से लाल धागे से बटी बत्ती।
- इसे काँच की चिमनी में अथवा गहरे दीपपात्र में रखें। जो ज्योति बुझती है, वह प्रायः पंखे, दरवाज़े या खिड़की की हवा से बुझती है — किसी दैवी कारण से नहीं।
- तेल या घी समाप्त होने से पहले भरें, और तब कभी नहीं जब लौ ऊँची हो; प्रतिदिन प्रातः एक नियत समय पर भरें, ताकि यह नित्यकर्म बन जाए और आधी रात की भागदौड़ न रहे।
- घर में कोई रहे। परंपरा यह है कि जिस घर में कलश और ज्योति स्थापित हों, उसे नौ दिन बंद कर खाली न छोड़ा जाए — यदि परिवार को यात्रा पर जाना है तो सच्चा निर्णय यही है कि उस वर्ष स्थापना न की जाए।
- पर्दे, वस्त्र, कागज़ तथा किसी भी ज्वलनशील वस्तु से दूर रखें। घर में नौ दिन जलती खुली लौ वास्तविक अग्नि-जोखिम है, और परंपरा ने कभी इस विषय में असावधानी की अनुमति नहीं दी।
- यदि बुझ जाए: पुनः प्रज्वलित करें, त्रुटि के लिए संक्षिप्त क्षमा प्रार्थना करें, और आगे बढ़ें। परंपरा बुझी ज्योति को खेद और सुधार योग्य भूल मानती है — अपशकुन नहीं, और घर पर कोई शाप तो कदापि नहीं। जो इससे भिन्न कहे, वह मार्ग नहीं दिखा रहा, भय दिखा रहा है।
नौ स्वरूप और नौ ग्रह
नवग्रह शांति की परंपरा में एक प्राचीन सम्बन्ध मिलता है जो नवदुर्गा के नौ स्वरूपों को नौ ग्रहों से जोड़ता है। यही कारण है कि ज्योतिष में नवरात्रि केवल भक्ति-पर्व नहीं, नौ दिन का ग्रह-उपाय भी मानी जाती है — स्वरूप की आराधना करते हुए आप उस ग्रह को साध रहे होते हैं।
| स्वरूप | ग्रह | किस क्षेत्र के लिए |
|---|---|---|
| शैलपुत्री | चंद्र | मन, मानसिक स्थिरता, माता |
| ब्रह्मचारिणी | मंगल | संयम, नियंत्रित ऊर्जा |
| चंद्रघंटा | शुक्र | सम्बन्धों में सामंजस्य, सुख |
| कूष्मांडा | सूर्य | आरोग्य, पद-प्रतिष्ठा, ओज |
| स्कंदमाता | बुध | बुद्धि, वाणी, संतान |
| कात्यायनी | गुरु | विवाह, ज्ञान, आशीर्वाद |
| कालरात्रि | शनि | कठिन काल में धैर्य |
| महागौरी | राहु | भ्रम एवं आकस्मिक उलटफेर का शमन |
| सिद्धिदात्री | केतु | वैराग्य, पूर्णता, मोक्ष |
यह पारंपरिक सम्बन्ध है, गणना से निकला परिणाम नहीं — आपकी कुंडली में वस्तुतः किस ग्रह को बल चाहिए, यह उसके भाव, राशि, दशा और दृष्टि पर निर्भर करता है। मुफ़्त कुंडली से जान सकते हैं कि इस वर्ष नौ में से कौन-सा दिन आपके लिए विशेष है।
नवरात्रि व्रत: क्या खाएँ, क्या वर्जित
व्रत का कोई एक निश्चित नियम नहीं है। कुछ लोग नौ दिन निर्जल या केवल फलाहार का व्रत रखते हैं; बहुत से लोग प्रतिदिन एक सात्विक फलाहार लेते हैं; और सबसे प्रचलित मध्यम मार्ग है — केवल पहले दिन तथा अष्टमी या नवमी का व्रत। ये सभी मान्य हैं — बाध्यकारी वह संकल्प है जो आपने पहले दिन लिया, इसलिए संकल्प वही लें जिसे आप वास्तव में निभा सकें।
- ग्राह्य: कुट्टू, सिंघाड़ा एवं राजगिरा आटा, साबूदाना, समक चावल, आलू, शकरकंद, अरबी, कद्दू, सभी फल, दूध, दही, पनीर, मखाना, मेवा, घी।
- नमक: केवल सेंधा नमक — व्रत की अवधि में साधारण नमक वर्जित है।
- वर्जित: गेहूँ, चावल तथा सभी अनाज, दालें, प्याज-लहसुन, माँसाहार, अंडा, मद्य, तथा अधिकांश घरों में बाहर का बना कोई भी भोजन।
- बहुत से लोग व्रत न रखते हुए भी नौ दिन इनका पालन करते हैं: बाल-नाखून न काटना, दाढ़ी न बनाना, नया चमड़ा प्रयोग न करना, घर स्वच्छ रखना और पूजा-कक्ष में जूते-चप्पल न ले जाना।
- कठोर व्रत किन्हें नहीं रखना चाहिए: गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली स्त्रियाँ, बालक, वृद्धजन, मधुमेह से पीड़ित या नियमित औषधि लेने वाले। यह छूट स्वयं शास्त्रों ने दी है — जो व्रत शरीर को क्षति पहुँचाए, उसका कोई फल नहीं। पूजा और संयम बनाए रखें, आवश्यक आहार अवश्य लें।
मंत्र, और नवरात्रि पाठ में वास्तव में क्या होता है
सबसे सरल नित्य साधना है उस दिन के स्वरूप का नमस्कार मंत्र — पहले दिन ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः, और आगे प्रत्येक दिन उसी क्रम में उस दिन का नाम। नियत समय पर ग्यारह या एक सौ आठ बार इसका जप ही अपने आप में पूर्ण साधना है; इससे अधिक किसी से अपेक्षित नहीं है।
इसके आगे तीन पाठ लगभग सर्वत्र इस पर्व को थामे हुए हैं: नौ अक्षरों का नवार्ण मंत्र — ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे — जो समस्त चंडी परंपरा का बीज मंत्र है; देवी माहात्म्य की वह ध्रुव पंक्ति जो “या देवी सर्वभूतेषु…” से आरंभ होती है; और दुर्गा चालीसा, जिसे अधिकांश घरों में संध्या को सब मिलकर पढ़ते हैं।
दुर्गा सप्तशती — देवी माहात्म्य, तेरह अध्यायों में सात सौ श्लोक, तीन चरित्रों में विभक्त — इसका पूर्ण रूप है। परंपरा इसे एक क्रम में बाँधती है: पूर्व में कवच, अर्गला और कीलक, और अंत में सिद्ध कुंजिका स्तोत्र। नौ दिनों में इसका पाठ भिन्न-भिन्न रीति से होता है: प्रतिदिन एक अध्याय, प्रतिदिन सम्पूर्ण पाठ, अथवा अष्टमी को एक बार सम्पूर्ण। नए पाठक को परंपरा यही कहती है कि बिना तैयारी सप्तशती में हाथ लगाने के बजाय सिद्ध कुंजिका स्तोत्र या नवार्ण मंत्र से आरंभ करे, और उच्चारण छपे लिप्यंतरण से नहीं, किसी जानकार से सीखे।
एक बात स्पष्ट कह देना उचित है: हर वर्ष विशिष्ट फल के लिए जिन संपुट पाठ और तांत्रिक प्रयोगों का प्रचार होता है, वे आरंभिक साधना नहीं हैं, और किसी गृहस्थ की नवरात्रि उनके बिना अपूर्ण नहीं रहती। स्वयं परंपरा का कथन है कि नौ दिन निष्ठा से निभाई गई छोटी साधना, अधूरे मन से की गई बड़ी साधना से कहीं बड़ी है।
नौकरी के साथ नवरात्रि कैसे निभाएँ
नवरात्रि पर जो लिखा जाता है, वह प्रायः यह मानकर चलता है कि कोई दिन भर घर पर है। यदि ऐसा नहीं है, तो पर्व छोटा नहीं होता — संकल्प छोटा होता है। नीचे वह न्यूनतम रूप है जो फिर भी पूर्ण है, और इसका हर अंग परंपरा से है, कोई आधुनिक समझौता नहीं।
- पहला दिन: दीप जलाएँ, जो वास्तव में निभा सकें उसका संकल्प बोलकर लें, और उस दिन व्रत रखें। यदि प्रातः का समय निकल चुका हो तो मध्याह्न का अभिजित मुहूर्त मान्य विकल्प है — आपसे पर्व छूटा नहीं है।
- प्रतिदिन: उस दिन का नमस्कार मंत्र, ग्यारह बार, उस समय जो वास्तव में आपके लिए नियत हो — निकलने से पहले, या लौटने के बाद। नियत छोटा समय, अनियत बड़े समय से श्रेष्ठ है।
- यदि घर खाली रहेगा या इन नौ दिनों में यात्रा है, तो कलश और अखंड ज्योति की स्थापना न करें। ऐसी स्थिति में स्थापना न करना ही शुद्ध आचरण है — स्थापना करके उन्हें असावधान छोड़ देना नहीं।
- केवल पहले दिन तथा अष्टमी या नवमी का व्रत रखें। यह व्रत का मुख्य प्रचलित रूप है, कोई निम्न रूप नहीं, और दफ़्तर के दिनों में यह नौ दिन मेज़ पर बैठकर किए गए फलाहार से कहीं अधिक निभता है।
- अष्टमी या नवमी: कन्या पूजन, चाहे उसका सबसे छोटा किंतु सच्चा रूप ही क्यों न हो — अपने भवन की बच्चियों या परिजनों की कन्याओं को भोजन कराएँ, भेंट दें और नमस्कार करें। नौ की संख्या परंपरा है; परंपरा यह नहीं है कि नौ न जुट पाने के कारण कन्या पूजन ही छोड़ दिया जाए।
- दशमी: कुछ दान करें, और संकल्प का सचेत समापन करें। जो व्रत दसवें दिन केवल विस्मृत हो जाए, परंपरा उसी को अपूर्ण मानती है।
नवरात्रि के नौ रंग — और वे हर वर्ष क्यों बदलते हैं
हर नवरात्रि में जो नौ रंगों की सूची घूमती है, वह लोगों को इसलिए भ्रमित करती है क्योंकि दो वर्ष एक जैसी नहीं होती। कारण सरल है — रंग नौ देवियों से नहीं, सप्ताह के वारों से जुड़े हैं। प्रतिपदा जिस वार को पड़ती है, वहीं से क्रम बन जाता है।
- सोमवार — श्वेत
- मंगलवार — लाल
- बुधवार — गहरा नीला
- गुरुवार — पीला
- शुक्रवार — हरा
- शनिवार — धूसर (ग्रे)
- रविवार — नारंगी
नौ दिन एक सप्ताह से अधिक होते हैं, इसलिए कोई एक वार अवश्य दोहराया जाता है — 2026 में आरंभ और अष्टमी दोनों रविवार को हैं। प्रकाशित सूचियाँ प्रायः दोहराव पर मिलती-जुलती छाया (मयूर हरा, बैंगनी, गुलाबी) रख देती हैं ताकि नौ रंग भिन्न रहें। इन रंगों का कोई शास्त्रीय विधान नहीं है; यह आधुनिक और अत्यंत प्रिय परंपरा है, और इन्हें धारण करना व्रत का अंग नहीं है।
भारत भर में नौ रातों के रूप
- गुजरात — गरबो दीप के चारों ओर गरबा और डांडिया रास, जो सृष्टि-चक्र का प्रतीक हैं। यहाँ नृत्य ही उपासना है।
- पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा — षष्ठी से दशमी तक दुर्गा पूजा: पंडाल, बोधन एवं संधि पूजा, दशमी को सिंदूर खेला और उसके बाद विसर्जन।
- तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश — गोलू/बोम्मई कोलू की सीढ़ीनुमा गुड़िया सज्जा; मैसूर दसरा; तथा आंध्र में स्त्रियों का पुष्प-पर्व बतुकम्मा।
- उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, पंजाब — नौ रात रामलीला का मंचन, जिसका समापन दशहरे पर रावण दहन से होता है; घरों में जगराता और दुर्गा चालीसा का पाठ।
- महाराष्ट्र — अखंड ज्योति के साथ घटस्थापना, प्रतिदिन बढ़ाई जाने वाली माला, और स्वर्ण तथा वाहन क्रय के लिए नवरात्रि का विशेष महत्व।
- हिमाचल प्रदेश — कुल्लू दशहरा तब आरंभ होता है जब शेष भारत में उत्सव समाप्त होता है, और आगे एक सप्ताह चलता है।
ज्योतिष इन नौ दिनों को मुहूर्त-काल क्यों मानता है
नवरात्रि शुक्ल पक्ष में पड़ती है, जब चंद्रमा वृद्धिगत होता है — जिस भी कार्य को बढ़ाना हो, शास्त्र उसी दिशा को शुभ कहते हैं। इसके साथ आश्विन शुक्ल पक्ष में जितने शुभ योग एकत्र होते हैं, उन्हें जोड़ दीजिए — यही कारण है कि जो परिवार सामान्यतः पंचांग नहीं देखते, वे भी गृह प्रवेश, दुकान का उद्घाटन या वाहन क्रय इन्हीं नौ दिनों में रखते हैं।
दसवाँ दिन, विजयादशमी, इससे भी आगे है — यह वर्ष के साढ़े तीन अबूझ मुहूर्तों में से एक है, अर्थात् इतना शुभ दिन कि मुहूर्त देखने की आवश्यकता ही नहीं। यह स्थान दसवें दिन को प्राप्त है, उससे पूर्व की नौ रातों को नहीं — यदि आप दोनों में से चुन रहे हों तो यह जानना उपयोगी है।
किंतु यह शुभ काल आपकी अपनी कुंडली को निरस्त नहीं करता। सामान्यतः शुभ काल भी आपकी चालू दशा, गोचर और उस भाव से मिलता है जो आपके आरंभ किए जा रहे कार्य का स्वामी है। नवरात्रि का सच्चा उपयोग यही है कि इस काल के भीतर अपना दिन अपनी कुंडली देखकर चुनें।
- व्यवसाय, दुकान या नई नौकरी का आरंभ — केवल तिथि नहीं, उस विशेष कार्य का मुहूर्त देखें।
- वाहन, स्वर्ण या संपत्ति का क्रय — नवरात्रि और विजयादशमी पारंपरिक काल हैं; दूसरा धनतेरस है।
- विद्यारंभ — अध्ययन, संगीत या किसी भी नए अभ्यास का आरंभ, विशेषतः नवमी अथवा दशमी को।
- ग्रह उपाय — किसी निर्बल या पीड़ित ग्रह के लिए मंत्र जप या सप्तशती पाठ आरंभ करने का प्रचलित काल यही नौ दिन हैं।
नौ दिनों में क्या करें, क्या न करें
- यदि अखंड ज्योति प्रज्वलित की है तो उसे बिना विच्छेद जलाए रखें — पहले से तय कर लें कि तेल कौन भरेगा, और उसे वस्त्रों के पास अकेला न छोड़ें।
- प्रतिदिन जौ को जल दें और कलश को दशमी के विसर्जन तक अपने स्थान पर अविचल रखें।
- दान अवश्य करें: अन्न, वस्त्र अथवा किसी बालक की शिक्षा का व्यय। नवरात्रि में दान का महत्व व्रत के समान माना गया है।
- इन नौ दिनों में किसी स्त्री या कन्या का अनादर न करें — परंपरा स्पष्ट कहती है कि जिस घर में ऐसा होता है, वहाँ कन्या पूजन निष्फल है।
- यदि कलश और ज्योति स्थापित हैं तो नौ दिन घर को बंद कर बाहर न रहें — परंपरा यह है कि कोई एक सदस्य घर पर रहे, अन्यथा उस वर्ष स्थापना न करें।
- व्रत को वजन घटाने का उपाय न मानें। दिन में दो बार तला साबूदाना और आलू खाना उपवास नहीं है; फलाहार का उद्देश्य लघुता है, विकल्प नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नवरात्रि 2026 कब है?
शारदीय नवरात्रि 2026 का आरंभ रविवार 11 अक्टूबर को घटस्थापना से होता है और महानवमी सोमवार 19 अक्टूबर को है; विजयादशमी (दशहरा) मंगलवार 20 अक्टूबर को है। चैत्र नवरात्रि इससे पूर्व मार्च–अप्रैल में पड़ती है।
घटस्थापना का मुहूर्त क्या है?
यह नगर और वर्ष के अनुसार बदलता है, क्योंकि यह आपके स्थानीय सूर्योदय और उस दिन के राहुकाल से निकलता है। नियम यह है: दिन का प्रथम तृतीयांश, राहुकाल तथा चित्रा/वैधृति से बचते हुए, और विकल्प में मध्याह्न का अभिजित मुहूर्त। किसी अन्य नगर का छपा समय लेने के बजाय प्रतिपदा की प्रातः अपने नगर का पंचांग देखें।
क्या नौ के बजाय केवल दो दिन का व्रत रख सकते हैं?
हाँ। पहले दिन तथा अष्टमी या नवमी का व्रत नवरात्रि व्रत का अत्यंत प्राचीन और पूर्णतः मान्य रूप है, जिसे असंख्य परिवार निभाते हैं। महत्वपूर्ण है पहले दिन लिया गया संकल्प — जो रूप रखना है वह स्पष्ट कहें, और उसे निभाएँ।
किस दिन कौन-सा रंग पहनें?
रंग वार के अनुसार होते हैं, देवी के अनुसार नहीं — सोमवार श्वेत, मंगलवार लाल, बुधवार गहरा नीला, गुरुवार पीला, शुक्रवार हरा, शनिवार धूसर, रविवार नारंगी — इसीलिए प्रकाशित सूची हर वर्ष बदल जाती है। यह आधुनिक परंपरा है, शास्त्रीय विधान नहीं, और रंग धारण करना व्रत का अंग नहीं है।
कन्या पूजन अष्टमी को या नवमी को?
दोनों शुद्ध हैं और दोनों व्यापक रूप से प्रचलित हैं — यह सही-गलत का भेद नहीं, कुल एवं क्षेत्र की परंपरा है। उत्तर भारत के अधिकांश घरों में यह अष्टमी को होता है; अनेक घरों में हवन के साथ नवमी को। जो आपके बड़े निभाते आए हैं, वही निभाएँ।
क्या नवरात्रि व्यवसाय आरंभ करने या वाहन खरीदने के लिए शुभ है?
वर्ष में जो दो काल लोग ठीक इसी हेतु चुनते हैं, यह उनमें से एक है, और दसवें दिन की विजयादशमी अबूझ मुहूर्त है — बिना गणना के शुभ। फिर भी इस काल के भीतर दिन आपकी चालू दशा और उस भाव को देखकर चुनना चाहिए जो आरंभ किए जा रहे कार्य का स्वामी है; उस विशेष कार्य का मुहूर्त देखने में एक मिनट लगता है।
चैत्र और शारदीय नवरात्रि में क्या अंतर है?
स्वरूप वही नौ हैं, ऋतु और समापन-दिवस भिन्न हैं। चैत्र नवरात्रि वसंत में (मार्च–अप्रैल) आती है, हिंदू नववर्ष का आरंभ करती है और राम नवमी — श्रीराम के जन्म — पर समाप्त होती है। शारदीय शरद ऋतु में (सितंबर–अक्टूबर) आती है, अधिक बड़ा सार्वजनिक पर्व है, और विजयादशमी — राम तथा दुर्गा की विजय — पर समाप्त होती है।
नवरात्रि व्रत में क्या खा सकते हैं?
कुट्टू, सिंघाड़ा और राजगिरा का आटा, साबूदाना, समक चावल, आलू तथा अन्य कंद, फल, दूध, दही, पनीर, मखाना और मेवा — साधारण नमक के स्थान पर सेंधा नमक। अनाज, दालें, प्याज, लहसुन, माँसाहार और मद्य व्रत की अवधि में वर्जित हैं।
अंत में कलश और जौ के अंकुरों का क्या करें?
दशमी को कृतज्ञता के संक्षिप्त प्रार्थना के साथ कलश उठाया जाता है और उसका जल पूरे घर में छिड़का जाता है; जौ के अंकुर काटकर परिवारजनों को दिए जाते हैं — जिन्हें वे बटुए, तिजोरी या द्वार पर रखते हैं — और नारियल फोड़कर प्रसाद रूप में बाँटा जाता है। जो कुछ विसर्जित करना हो वह स्वच्छ जल में जाए, प्लास्टिक या धागे के बिना।
मेरी कुंडली के लिए नौ में से कौन-सा दिन सबसे महत्वपूर्ण है?
यह इस पर निर्भर है कि आपकी कुंडली में कौन-सा ग्रह निर्बल, पीड़ित अथवा दशा में चल रहा है — नौ स्वरूपों में से प्रत्येक परंपरा से एक ग्रह से जुड़ा है, अतः जिस ग्रह की स्थिति ऐसी हो, उसी का दिन आपके लिए विशेष है। मुफ़्त जन्म कुंडली आपके ग्रह-बल और चालू दशा दिखा देती है, और दिन उसी से निकल आता है।
इस पर्व के लिए मुफ़्त टूल
इस ऋतु के अन्य त्योहार
गणपति विसर्जन का दिन।
पितरों का पखवाड़ा — श्राद्ध और तर्पण।
असत्य पर सत्य की विजय।
जिस रात चाँद अमृत बरसाता है — चाँदनी में खीर।
अपनी कुंडली के बारे में लाइव सत्र में पूछिए
त्योहार का मुहूर्त सबके लिए एक है, आपकी कुंडली नहीं। ज्योतिष गुरु से पूछिए कि यह काल आपके करियर, विवाह, समय और उपायों के लिए क्या कहता है — निजी लाइव सत्र — प्रति-मिनट भुगतान, जब चाहें रोकें।
🪔 गणेश चतुर्थी विशेष — ज्योतिष गुरु त्योहार की प्रति-मिनट क़ीमत पर · जब चाहें रोकें
अपना सत्र शुरू करेंमित्रों को बुलाइए — उन्हें पहले रिचार्ज पर बोनस वॉलेट बैलेंस, और उनके परामर्श पर ख़र्च करते ही आपको ₹20 नक़द। रेफ़र करें और कमाएँ
त्योहारों की तिथियाँ चंद्र आधारित हैं और हर वर्ष बदलती हैं — योजना से पहले पंचांग पर पुष्टि अवश्य करें।